नमस्ते दोस्तों
क्या आपने कभी सोचा है कि आप भी राम राम जपते हैं और एक महान संत भी राम राम जपते हैं। मगर उनके राम कहने से पत्थर तैर जाते हैं और हमारे 108 बार माला जपने के बाद भी मन शांत नहीं होता?
शब्द तो वही है। भगवान का नाम भी वही है। फिर यह फर्क क्यों?
आज हम उस रहस्य को जानेंगे जो हमारे शास्त्रों में भगवान से भी ऊंचा बताया गया है।
गुरु साक्षात परब्रह्म
हम सबने बचपन से एक श्लोक सुना है।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
यह श्लोक यह नहीं कह रहा कि गुरु ब्रह्मा जैसे हैं। बल्कि यह कह रहा है कि गुरु ही ब्रह्मा हैं गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही शिव हैं।
शास्त्र कहते हैं कि गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा है। ऐसा क्यों? क्योंकि भगवान ने तो हमें यह संसार दिया है पर गुरु हमें उस संसार से मुक्ति का रास्ता दिखाते हैं।
नाम जाप और गुरु मंत्र में क्या अंतर है?
आप जो खुद से भगवान का कोई भी नाम जपते हैं वह नाम जाप है। उससे पुण्य जरूर मिलता है।
लेकिन गुरु मंत्र वह है जो एक सिद्ध गुरु अपनी परंपरा और अपने संकल्प के साथ आपको देते हैं। नाम जाप आपकी अपनी कोशिश है जबकि गुरु मंत्र में गुरु की शक्ति जुड़ जाती है।
इसे एक कहानी से समझते हैं।
राजा और महात्मा की कहानी
एक बार एक राजा एक महात्मा के पास गया और बोला कि महाराज मुझे कोई असली गुरु मंत्र दीजिए जिससे मुझे शांति मिले।
महात्मा ने कहा कि तुम राम नाम का जाप करो।
राजा को गुस्सा आ गया। उसने कहा कि यह तो मैं बचपन से कर रहा हूं। मुझे कोई गुप्त मंत्र चाहिए।
महात्मा ने कहा कि ठीक है। इसके लिए तुम्हें मुझे अपने दरबार में बुलाना होगा।
अगले दिन महात्मा दरबार में पहुंचे और राजा के सिंहासन पर बैठ गए। बैठते ही उन्होंने सैनिकों को आदेश दिया कि इस राजा को गिरफ्तार कर लो।
सैनिक चुपचाप खड़े रहे। किसी ने महात्मा की बात नहीं मानी।
तब राजा ने गुस्से में कहा कि सैनिकों इस ढोंगी महात्मा को पकड़ लो।
राजा का इतना कहना था कि सारे सैनिक महात्मा की तरफ दौड़ पड़े।
महात्मा मुस्कुराए और बोले कि राजन यही तुम्हारा असली गुरु मंत्र है। जो शब्द मैंने कहे वही शब्द तुमने कहे। पर मेरे शब्दों का कोई असर नहीं हुआ और तुम्हारे शब्दों ने सैनिकों को दौड़ा दिया।
क्यों? क्योंकि तुम्हारे शब्दों के पीछे राज सत्ता का अधिकार था।
शक्ति अधिकार में होती है
यही गुरु मंत्र का सबसे बड़ा रहस्य है। शब्द वही होते हैं लेकिन शक्ति उस शब्द के पीछे बैठे अधिकार और संकल्प में होती है।
जब एक सिद्ध गुरु अपनी तपस्या की शक्ति से आपको कोई नाम देता है तो वह नाम जाग्रत हो जाता है। वह साधारण शब्द नहीं रहता बल्कि एक बीज मंत्र बन जाता है।
भगवान को गुरु की क्या जरूरत?
भगवान राम ने गुरु वशिष्ठ से और भगवान कृष्ण ने गुरु संदीपनि से शिक्षा ली थी। वह तो स्वयं भगवान थे उन्हें क्या जरूरत थी?
वे हमें सिखा रहे थे कि बिना गुरु के इस संसार सागर से पार नहीं जाया जा सकता।
जब तक अर्जुन कृष्ण को अपना दोस्त समझते रहे तब तक वे मोह में फंसे रहे। जिस पल उन्होंने कहा कि मैं आपका शिष्य हूं उसी पल गीता का ज्ञान शुरू हुआ।
कुछ जरूरी नियम
गोपनीयता: गुरु मंत्र को कभी किसी को बताना नहीं चाहिए। यहां तक कि पति पत्नी भी एक दूसरे को नहीं बता सकते। इसे बताने से इसका असर कम हो जाता है।
मानसिक जाप: गुरु मंत्र का जाप जोर से बोलकर नहीं बल्कि मन ही मन किया जाता है।
साधना: गुरु मंत्र मिल गया इसका मतलब यह नहीं कि अब सब अपने आप हो जाएगा। गुरु आपको बीज देते हैं उसे साधना रूपी पानी से सींचना आपका काम है।
निष्कर्ष
जब आप खुद से भगवान का नाम लेते हैं तो आप दरवाजा खटखटा रहे हैं। लेकिन जब गुरु आपको मंत्र देते हैं तो वे आपको उस दरवाजे की चाबी दे देते हैं।
इसीलिए कबीरदास जी ने कहा है
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय॥
क्या आपके पास गुरु मंत्र है या आप अभी भी खोज में हैं? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
