नमस्कार दोस्तों
मीराबाई ने श्री कृष्ण को देखा था। सूरदास जी ने अपनी मन की आंखों से उन्हें देखा था। चैतन्य महाप्रभु उनसे बातें करते थे। और अभी कुछ ही समय पहले रामकृष्ण परमहंस ने मां काली को अपने हाथों से भोग खिलाया।
तो सवाल यह है कि क्या यह सब सिर्फ सतयुग या त्रेता की बातें हैं? क्या आज इस घोर कलियुग में हम भगवान के साक्षात दर्शन कर सकते हैं? या फिर हम बस मूर्तियों को पूज रहे हैं?
आज हम इसी गहरे सवाल का जवाब ढूंढेंगे। आज मैं आपको कुछ ऐसा बताने वाली हूं जिससे आपके इष्ट देवता भी आपके सामने आकर खड़े हो जाएंगे।
क्या कलियुग दर्शन में बाधा है?
भागवत पुराण में लिखा है कि कलियुग में धर्म का नाश होगा और लोगों का मन मैला होगा। तो ऐसे समय में भगवान क्यों आएंगे?
सच्चाई यह है कि भगवान के दर्शन न होने का कारण कलियुग नहीं है बल्कि हमारी आंखें हैं। हम भगवान को अपनी चमड़े की आंखों से देखना चाहते हैं।
जब अर्जुन ने कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान का विराट रूप देखना चाहा तो भगवान ने कहा था कि तुम मुझे अपनी इन साधारण आंखों से नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूं।
अगर अर्जुन जैसे महान भक्त को दिव्य दृष्टि की जरूरत पड़ी तो हमें और आपको क्यों नहीं पड़ेगी?
यानी दर्शन होंगे पर इन आंखों से नहीं बल्कि प्रेम और भाव की आंखों से।
रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण
हमें दिव्य आंखें कैसे मिलेंगी? क्या इसके लिए हजारों साल तपस्या करनी होगी?
नहीं। गीता में भगवान कहते हैं कि केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे देखा जा सकता है।
इसका सबसे बड़ा सबूत रामकृष्ण परमहंस हैं। वे मां काली की मूर्ति को पूजते नहीं थे बल्कि उनसे जिद करते थे। वे एक बच्चे की तरह रोते थे कि मां तू है या नहीं?
एक दिन उनकी तड़प इतनी बढ़ गई कि मां काली को आना ही पड़ा। उन्होंने देखा कि मूर्ति पत्थर नहीं बल्कि जीवित है। यह कलियुग की घटना है जो साबित करती है कि दर्शन आज भी संभव हैं।
भगवान के दर्शन के 4 आसान तरीके
भगवान जानते थे कि कलियुग में हम कमजोर होंगे। हम रामकृष्ण जैसी कठोर तपस्या शायद न कर पाएं। इसलिए उन्होंने दर्शन देने के चार शॉर्टकट बनाए हैं।
1. नाम रूप में दर्शन:
संत कहते हैं कि कलियुग केवल नाम अधारा। भगवान के नाम में और भगवान में कोई फर्क नहीं है। जब आप हरे कृष्ण या श्री राम बोलते हैं तो आप भगवान को अपनी जुबान पर महसूस कर रहे होते हैं।
2. ग्रंथ रूप में दर्शन:
श्रीमद्भागवत पुराण और गीता भगवान का वाणी रूपी अवतार हैं। जब आप इन्हें पढ़ते हैं तो आप किसी किताब को नहीं बल्कि साक्षात कृष्ण को सुन रहे होते हैं।
3. मूर्ति रूप में दर्शन:
मंदिर की मूर्ति पत्थर नहीं है। यह भगवान का अर्चा विग्रह अवतार है। भगवान ने हमारी खातिर पत्थर के रूप में आना स्वीकार किया है ताकि हम उनकी सेवा कर सकें। जब आप मूर्ति को भोग लगाते हैं तो आप साक्षात भगवान को खिला रहे होते हैं।
4. संत रूप में दर्शन:
भगवान खुद कहते हैं कि आचार्य या गुरु को मेरा ही स्वरूप जानो। एक सच्चे संत के दर्शन करना भगवान के चलते फिरते स्वरूप का दर्शन करना है।
निष्कर्ष
तो क्या कलियुग में भगवान के दर्शन संभव हैं?
जवाब है हां। 100% संभव हैं।
अगर आपकी भक्ति रामकृष्ण जैसी है तो आपको साक्षात दर्शन होंगे। और अगर हम अभी उस स्तर पर नहीं हैं तो भी भगवान हमें नाम ग्रंथ संत और मूर्ति के रूप में चौबीसों घंटे दर्शन दे रहे हैं।
सवाल यह नहीं है कि भगवान हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमारी आंखें उन्हें देखने के लिए तैयार हैं?
आपको भगवान के किस रूप में उनकी मौजूदगी सबसे ज्यादा महसूस होती है? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
