क्या आपके घर में भी बार बार बिना वजह परेशानियां आती रहती हैं? क्या परिवार में कलह रहता है या फिर तरक्की रुक गई है?
जरा सोचिए। कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि आप अपनी जड़ों से कट गए हैं?
जब एक पौधा अपनी मिट्टी और जड़ों को भूल जाता है तो वह कभी फल फूल नहीं सकता। ठीक वैसे ही जब हम अपनी आध्यात्मिक जड़ों यानी अपने गोत्र और कुलदेवी को भूल जाते हैं तो हमारे जीवन में अकारण कष्ट आने लगते हैं।
आज की इस पोस्ट में हम इसी गहरे रहस्य को सुलझाएंगे। आज हम जानेंगे कि आखिर गोत्र क्या होता है? वे सात महान ऋषि कौन हैं जिनसे हम जुड़े हैं? और सबसे जरूरी बात कि आप अपनी भूली हुई कुलदेवी का पता कैसे लगा सकते हैं?
गोत्र आखिर है क्या?
सबसे पहले गोत्र को समझते हैं। गोत्र शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है। गौ यानी गाय और त्र यानी रक्षा करना। पुराने जमाने में इसका मतलब गायों का बाड़ा होता था जो एक परिवार की सामूहिक संपत्ति होती थी।
लेकिन बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार गोत्र का गहरा अर्थ है हमारी वंशावली। यह हमारी पहचान है। यह बताता है कि हमारे पूर्वज किस महान वैदिक ऋषि के शिष्य या वंशज रहे हैं।
वे 7 ऋषि जो हमारे पूर्वज हैं
हमारी पूरी गोत्र प्रणाली सप्तर्षियों यानी सात महान ऋषियों पर आधारित है। यही वे ऋषि थे जिन्होंने वेदों के ज्ञान को आगे बढ़ाया। क्या आप जानते हैं कि ये कौन हैं?
अत्रि: इन्होंने अथर्ववेद के मंत्रों की रचना की और ये चंद्रमा के पिता हैं।
भारद्वाज: ये महान गुरु द्रोणाचार्य के पिता थे और आयुर्वेद के ज्ञानी थे।
गौतम: इन्होंने न्याय दर्शन और न्याय सूत्र की रचना की।
जमदग्नि: भगवान परशुराम के पिता जो अपनी कठिन तपस्या के लिए जाने जाते थे।
कश्यप: सृष्टि के शुरुआती समय के महान ऋषि जिनसे देव और असुर दोनों की उत्पत्ति हुई।
वसिष्ठ: भगवान राम के कुलगुरु और वसिष्ठ स्मृति के रचयिता।
विश्वामित्र: इन्होंने कठोर तप से ब्रह्मर्षि का पद पाया और हमें गायत्री मंत्र दिया।
इनके अलावा अगस्त्य और अंगिरस ऋषि को भी मुख्य गोत्र प्रवर्तकों में गिना जाता है। सोचिए आपकी रगों में इन महान ऋषियों का अंश है। यह कितनी गर्व की बात है।
कुलदेवी क्यों जरूरी हैं?
गोत्र अगर आपकी वंशावली है तो कुलदेवी आपके परिवार की आध्यात्मिक रक्षक हैं। कुल का मतलब है परिवार और देवी का अर्थ है दिव्य शक्ति।
ये वो देवियां हैं जिनकी पूजा आपके पूर्वज पीढ़ियों से करते आ रहे थे। ये सिर्फ पत्थर की मूर्ति नहीं हैं। ये आपके परिवार की सामूहिक आस्था का केंद्र हैं। जब हम इन्हें भूल जाते हैं तो परिवार से सुरक्षा कवच हट जाता है और पितृ दोष जैसी समस्याएं आने लगती हैं।
अपनी कुलदेवी का पता लगाने के 3 पक्के तरीके
गोत्र तो आपको कोई भी पंडित बता देगा लेकिन कुलदेवी का नाम जानना सबसे कठिन काम है। अगर आपको अपनी कुलदेवी नहीं मालूम तो घबराएं नहीं। इन तीन तरीकों से आप उनका पता लगा सकते हैं।
पहला तरीका: घर के बड़े बुजुर्ग
यह सबसे उत्तम तरीका है। अपने दादा दादी या नाना नानी से पूछिए। उनसे पूछिए कि हमारे मूल गाँव में किस देवी का मंदिर है? पुराने शादी के कार्ड या जमीन के कागजात देखिए। पता कीजिए कि शादी या मुंडन के वक्त आपके परिवार में किस देवी के मंदिर में धोक लगाने या हाजिरी देने की रस्म होती थी। वही आपकी कुलदेवी होंगी।
दूसरा तरीका: अपने समाज के लोग
अगर परिवार में किसी को नहीं पता तो अपने ही गोत्र के दूसरे लोगों से संपर्क करें। जिनका गोत्र और मूल स्थान आपके जैसा है उनकी कुलदेवी भी अक्सर वही होती हैं जो आपकी हैं।
तीसरा तरीका: रस्मो रिवाज पर ध्यान दें
ध्यान दीजिए कि आपके घर में श्राद्ध या पितृ पक्ष के समय किस देवी का नाम लिया जाता है। या साल में एक बार किस देवी की विशेष कढ़ाई या पूजा होती है।
क्या सुपारी से कुलदेवी का पता चलता है?
आपने सुना होगा कि तकिए के नीचे सुपारी रखकर सोने से देवी सपने में आती हैं। यह एक लोक मान्यता है। कई लोग कहते हैं कि 11 मंगलवार तक व्रत रखकर और रात को देवी से प्रार्थना करके सुपारी सिरहाने रखकर सोने से सपना आता है।
हालांकि शास्त्रों में इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। पर भक्ति में बड़ी शक्ति है। आप यह उपाय आजमा सकते हैं।
लेकिन सबसे सही तरीका यह है कि आप एक कलश में जल भरकर उसे ही कुलदेवी का स्वरूप मान लें। रोज उसके आगे धूप दीप जलाएं और सच्चे मन से प्रार्थना करें कि हे माँ मुझे दर्शन दें और मेरा मार्गदर्शन करें। आपकी सच्ची पुकार उन तक जरूर पहुंचेगी।
पूजा कैसे करें?
जब आपको कुलदेवी का पता चल जाए तो उनकी विधि विधान से पूजा करें।
आप ॐ कुलदेव्यै नमः मंत्र का जाप कर सकते हैं।
उन्हें खीर या फल का भोग लगाएं। याद रखिए कुलदेवी की पूजा से ही पितृ दोष शांत होता है और घर में सुख शांति आती है।
अपनी जड़ों से जुड़िए और अपनी कुलदेवी का आशीर्वाद प्राप्त कीजिए।