नमस्ते दोस्तों
क्या आप जानते हैं कि जिस मंदिर को आप महज पत्थर की एक सुंदर इमारत समझते हैं वह असल में हजारों साल पुरानी एक एनर्जी मशीन है?
जी हां आपने बिल्कुल सही पढ़ा।
हम सब मंदिर जाते हैं। कोई शांति की तलाश में जाता है तो कोई अपनी मन्नत मांगने। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते ही मन अचानक शांत क्यों हो जाता है? वहां की हवा अलग क्यों महसूस होती है? वहां गूंजने वाली घंटी की आवाज हमारे भीतर तक क्यों उतर जाती है?
आज हम इसी रहस्य से पर्दा उठाएंगे। आज हम जानेंगे कि हमारे ऋषियों ने मंदिरों को धरती के खास चुंबकीय केंद्रों पर क्यों बनाया था और इसका हमारे शरीर से क्या गहरा संबंध है।
मंदिर एक कॉस्मिक पावर स्टेशन है
हजारों साल पहले जब आज जैसा आधुनिक विज्ञान नहीं था तब हमारे ऋषियों ने एक अद्भुत सत्य खोज लिया था। वे कहते थे कि "यत् पिण्डे तद् ब्रह्माण्डे" यानी जो इस ब्रह्मांड में है वही हमारे शरीर के कण कण में है।
हमारे प्राचीन मंदिर इसी सिद्धांत पर बनाए गए हैं। ये मंदिर कोई साधारण इमारतें नहीं हैं बल्कि ये ऊर्जा के पावर हाउस हैं। इन्हें पृथ्वी की चुंबकीय तरंग रेखाओं पर बनाया जाता है। यही कारण है कि यहां सकारात्मक ऊर्जा बहुत ज्यादा होती है और यहां आते ही हमारी मानसिक शक्ति बढ़ने लगती है।
वास्तु पुरुष मंडल का रहस्य
मंदिर बनाने से पहले जमीन पर एक खास नक्शा बनाया जाता है जिसे वास्तु पुरुष मंडल कहते हैं। यह हमारे शरीर और ब्रह्मांड की ऊर्जा का एक खाका है।
इसमें वास्तु पुरुष को पेट के बल लेटा हुआ माना जाता है। उनका सिर ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व में होता है और पैर नैऋत्य कोण यानी दक्षिण पश्चिम में होते हैं।
ईशान कोण में सिर होने का मतलब है कि यह ज्ञान और बुद्धि की दिशा है। मंदिर का बीच का हिस्सा जिसे ब्रह्मस्थान कहते हैं उसे हमेशा खुला रखा जाता है ताकि ब्रह्मांडीय ऊर्जा लगातार बहती रहे। ठीक वैसे ही जैसे हमारे शरीर में नाभि जीवन का केंद्र होती है।
आपके 7 चक्र और मंदिर की बनावट
अब मैं आपको जो बताने जा रही हूं उसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर के सात चक्र और मंदिर की दिशाओं का सीधा संबंध है?
मंदिर का हर हिस्सा हमारे शरीर के किसी न किसी चक्र से जुड़ा हुआ है। आइए इसे समझते हैं।
1. मूलाधार चक्र
यह हमारी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में होता है और सुरक्षा का प्रतीक है। वास्तु में यह दक्षिण पश्चिम दिशा से जुड़ा है।
2. स्वाधिष्ठान चक्र
यह जल तत्व से जुड़ा है और भावनाओं का केंद्र है। यह पश्चिम दिशा से मेल खाता है। इसीलिए पुराने मंदिरों में पश्चिम की तरफ जलकुंड या तालाब बनाए जाते थे।
3. मणिपूर चक्र
यह हमारी नाभि और अग्नि का केंद्र है। यह मंदिर के ब्रह्मस्थान यानी बिल्कुल बीच के हिस्से से जुड़ा है जहां से सारी ऊर्जा बहती है।
4. अनाहत चक्र
यह हमारे दिल और वायु तत्व से जुड़ा है। यह उत्तर पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व करता है।
5. विशुद्ध चक्र
यह हमारे गले में होता है और वाणी का केंद्र है। यह उत्तर पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में स्थित है। मंदिर में गूंजने वाली ॐ की ध्वनि इसी आकाश तत्व में कंपन पैदा करती है।
6. आज्ञा चक्र
यह हमारी दोनों आंखों के बीच ध्यान का केंद्र है। इसी स्थान पर मंदिर का गर्भगृह बनाया जाता है जहां भगवान की मूर्ति होती है। यह वह जगह है जहां भक्त और भगवान का मिलन होता है।
7. सहस्रार चक्र
यह हमारे सिर का सबसे ऊपरी हिस्सा है जहां हमारी चेतना ब्रह्मांड से मिलती है। मंदिर का शिखर और उस पर लगा कलश इसी का प्रतीक है। यह वह बिंदु है जहां धरती और आकाश मिलते हैं।
निष्कर्ष
तो दोस्तों अगली बार जब आप किसी मंदिर में जाएं तो उसे सिर्फ ईंट पत्थर मत समझिएगा।
थोड़ा रुकिए और आंखें बंद कीजिए। महसूस कीजिए कि आप एक विशाल यंत्र के भीतर खड़े हैं।
गर्भगृह में खड़े होकर सोचिए कि यह मंदिर मेरे ही शरीर का एक बड़ा रूप है। जब आप इस सोच के साथ मंदिर में बैठते हैं तो मंदिर की ऊर्जा और आपके शरीर की ऊर्जा एक हो जाती है। यही वह पल होता है जब आपको परम शांति मिलती है।
आप कहीं बाहर ईश्वर को नहीं खोज रहे बल्कि आप वापस अपने ही भीतर आ रहे हैं। आपका शरीर ही सबसे पवित्र मंदिर है।
आपको मंदिर विज्ञान की यह जानकारी कैसी लगी? क्या आपने कभी मंदिर में ऐसी ऊर्जा महसूस की है? मुझे कमेंट करके जरूर बताएं।
