शंकराचार्य कहते हैं 'मैं भोक्ता नहीं' जबकि कृष्ण गीता में कहते हैं 'मैं ही भोक्ता हूँ'। जानें इन दोनों विचारों का समन्वय और असली Spiritual Maturity का अर्थ।
अक्सर हम सोचते हैं कि मैच्युरिटी (परिपक्वता) का मतलब है उम्र का बढ़ना या दुनियादारी की समझ होना। लेकिन अगर हम सनातन दर्शन की गहराई में उतरें, तो असली मैच्युरिटी वही है जब आप विरोधाभासों (Paradoxes) के बीच के सत्य को समझ जाएं।
जब आप एक तरफ आदि गुरु शंकराचार्य को सुनें और दूसरी तरफ योगेश्वर श्री कृष्ण को, तो एक साधारण मन भ्रमित हो सकता है। लेकिन एक परिपक्व साधक वहां 'योग' (जुड़ाव) देख लेता है। आइए, इसे शास्त्रों के दो महान उद्घोषों से समझते हैं।
1. शंकराचार्य जी की दृष्टि: "मैं भोक्ता नहीं हूँ"
जब हम निर्वाण षटकम् पढ़ते हैं, तो आदि शंकराचार्य हमें हमारे शुद्ध स्वरूप (आत्मा) की याद दिलाते हैं। वे कहते हैं:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवॊऽहम् ॥ (मैं न भोजन हूँ, न भोग्य हूँ और न ही भोक्ता (भोगने वाला) हूँ। मैं तो चैतन्य और आनन्द स्वरूप शिव हूँ, मैं शिव हूँ।)
यहाँ वे कह रहे हैं कि आत्मा निर्लिप्त है। उसे संसार के सुख-दुःख या कर्म-फल से कोई मतलब नहीं है।
2. श्री कृष्ण की दृष्टि: "मैं ही भोक्ता हूँ"
वहीं दूसरी ओर, भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण बार-बार यह घोषणा करते हैं कि "भोक्ता" (Enjoyer) केवल वही हैं।
अध्याय 9, श्लोक 24:
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। (निश्चय ही सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ।)
अध्याय 5, श्लोक 29:
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। (मुझे ही सब यज्ञ और तपों का भोक्ता जानकर भक्त शांति को प्राप्त होता है।)
इतना ही नहीं, अध्याय 15 (श्लोक 14) में तो वे और भी सूक्ष्म स्तर पर उतर आते हैं। वे कहते हैं कि जो भोजन आप कर रहे हैं, उसे पचाने वाली अग्नि भी मैं हूँ:
अहं वैश्वानरो भूत्वा... पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥ (मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित 'वैश्वानर' अग्नि रूप होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।)
तो फिर सत्य क्या है? हम 'भोक्ता' हैं या नहीं?
यहीं पर आपकी आध्यात्मिक मैच्युरिटी काम आती है। भक्ति दरअसल अद्वैत (Non-dualism) और द्वैत (Dualism) के झगड़े में बंटी ही नहीं है। भक्ति वो समझ है जहाँ आप जान जाते हैं कि आपका आराध्य लिप्त भी है और निर्लिप्त भी। सत्य यह है कि हम (जीवात्मा) जब तक अहंकार वश यह सोचते हैं कि "मैं कर रहा हूँ" या "मैं भोग रहा हूँ", तब तक हम बंधन में हैं। श्री कृष्ण अध्याय 13, श्लोक 23 में इसे स्पष्ट करते हैं:
उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वर:।
इस देह में स्थित वह परमात्मा ही साक्षी (Upadrashta) भी है और भोक्ता भी।
निष्कर्ष: सीमाओं में भी और सीमाओं से परे भी
मैच्युरिटी यह समझने में है कि:
व्यवहार में: जब भूख लगे और भोजन पचे, तो समझें कि भीतर बैठे कृष्ण (वैश्वानर) भोग लगा रहे हैं। (यहाँ कृष्ण लिप्त हैं)।
तत्व में: जब जीवन में सुख-दुःख आए, तो शंकराचार्य की तरह साक्षी भाव में रहें कि "मैं यह शरीर नहीं, मैं शिव स्वरूप आत्मा हूँ।" (यहाँ आप निर्लिप्त हैं)।
दैवीय शक्तियां सीमाओं में (शरीर के भीतर अग्नि रूप में) भी हैं और सीमाओं से परे (ब्रह्म रूप में) भी हैं।
जिस दिन आप यह समझ जाते हैं कि "करने वाला भी वो, और भोगने वाला भी वो", उस दिन जीवन से शिकायतें खत्म हो जाती हैं। कर्तापन का बोझ उतर जाता है और यही सच्ची भक्ति है।
जय श्री कृष्ण। हर हर महादेव।
